नरपतिरभवत् सदैवताभ्य:
प्रयतमनास्त्वभिसंस्तुवंश्च ता: स्म।
न च धुरि नृप गामयुक्त भूय-
स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र॥ ३१॥
अनुवाद
नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदैव विनम्र मन से गौओं की स्तुति करते थे। उन्होंने फिर कभी बैल को सवारी के रूप में नहीं लिया। वे केवल अच्छे घोड़ों पर ही इधर-उधर भ्रमण करते थे।
Narendra! King Yudhishthira always used to praise cows with a humble mind. He never used a bull for riding again. He used to travel here and there only on good horses.
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानकथने षट्सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥