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mahabharat 13.78.31: नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदैव विनम्र मन से गौओं की स्तुति करते थे। उन्होंने फिर कभी बैल को सवारी के रूप में नहीं लिया। वे केवल अच्छे घोड़ों पर ही इधर-उधर भ्रमण करते थे।   |   mahabharat अध्याय 13.78: गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 78: गोदानकी विधि, गौओंसे प्रार्थना, गौओंके निष्क्रय और गोदान करनेवाले नरेशोंके नाम  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.78.31 
नरपतिरभवत् सदैवताभ्य:
प्रयतमनास्त्वभिसंस्तुवंश्च ता: स्म।
न च धुरि नृप गामयुक्त भूय-
स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
नरेन्द्र! राजा युधिष्ठिर सदैव विनम्र मन से गौओं की स्तुति करते थे। उन्होंने फिर कभी बैल को सवारी के रूप में नहीं लिया। वे केवल अच्छे घोड़ों पर ही इधर-उधर भ्रमण करते थे।
 
Narendra! King Yudhishthira always used to praise cows with a humble mind. He never used a bull for riding again. He used to travel here and there only on good horses.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानकथने षट्सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)