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mahabharat 13.77.38-39: तपस्वी ब्राह्मणों में यह बात स्पष्ट रूप से देखी जाती है; क्योंकि ब्रह्मचारी के प्रहार से स्वयं इंद्र भी भयभीत रहते हैं। यहाँ ऋषियों में ब्रह्मचर्य का फल दृष्टिगोचर होता है। अब माता-पिता आदि के पूजन से जो धर्म प्राप्त होता है, उसके विषय में मुझसे सुनो ॥38-39॥   |   mahabharat अध्याय 13.77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  13.77.38-39 
प्रत्यक्षं हि तथा ह्येतद् ब्राह्मणेषु तपस्विषु।
बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षित:॥ ३८॥
तद् ब्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते।
मातापित्रो: पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
तपस्वी ब्राह्मणों में यह बात स्पष्ट रूप से देखी जाती है; क्योंकि ब्रह्मचारी के प्रहार से स्वयं इंद्र भी भयभीत रहते हैं। यहाँ ऋषियों में ब्रह्मचर्य का फल दृष्टिगोचर होता है। अब माता-पिता आदि के पूजन से जो धर्म प्राप्त होता है, उसके विषय में मुझसे सुनो ॥38-39॥
 
This is clearly seen in ascetic Brahmins; because even Indra himself is afraid of the attack of a brahmacari. The result of celibacy is visible here in sages. Now listen to me about the religion that is achieved by worshipping parents etc. ॥ 38-39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)