श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.77.35 
आजन्ममरणाद् यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह।
न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! यह जान लो कि जो जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त ब्रह्मचारी रहता है, उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है ॥ 35॥
 
O lord of men! Know this that nothing is unattainable for one who remains a celibate from birth till death. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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