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mahabharat 13.77.14-15: दान से संयम श्रेष्ठ है। दानशील व्यक्ति ब्राह्मण को दान देते समय कभी-कभी क्रोधित हो सकता है; किन्तु जो व्यक्ति वश में है या जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह कभी क्रोधित नहीं होता; अतः दान से संयम श्रेष्ठ है। जो दाता क्रोध रहित होकर दान देता है, वह सनातन लोक को प्राप्त होता है ॥14-15॥   |   mahabharat अध्याय 13.77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  13.77.14-15 
दानाद् दमो विशिष्टो हि ददत्किंचित् द्विजातये॥ १४॥
दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दम:।
यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोका: सनातना:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
दान से संयम श्रेष्ठ है। दानशील व्यक्ति ब्राह्मण को दान देते समय कभी-कभी क्रोधित हो सकता है; किन्तु जो व्यक्ति वश में है या जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह कभी क्रोधित नहीं होता; अतः दान से संयम श्रेष्ठ है। जो दाता क्रोध रहित होकर दान देता है, वह सनातन लोक को प्राप्त होता है ॥14-15॥
 
Self-control is superior to charity. A charitable person may sometimes get angry while giving charity to a Brahmin; but a person who is subdued or has controlled his senses never gets angry; hence self-control is superior to charity. A donor who gives charity without getting angry attains the eternal world. ॥14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)