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mahabharat 13.77.10: वेदों के स्वाध्याय का फल इस लोक में भी और परलोक में भी देखा जा सकता है। वेदों का अध्ययन करने वाला ब्राह्मण इस लोक में भी और ब्रह्मलोक में भी सदा सुख भोगता है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 13.77: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.77.10 
स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च।
इहलोकेऽथवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वेदों के स्वाध्याय का फल इस लोक में भी और परलोक में भी देखा जा सकता है। वेदों का अध्ययन करने वाला ब्राह्मण इस लोक में भी और ब्रह्मलोक में भी सदा सुख भोगता है।॥10॥
 
The fruits of self-study of the Vedas can be seen in this world as well as the next. A Brahmin who studies the Vedas always enjoys happiness in this world as well as in the Brahmaloka.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)