श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 76: दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.76.5 
ये दोषा यादृशाश्चैव द्विजयज्ञोपघातके।
विक्रये चापहारे च ते दोषा वै स्मृता: प्रभो॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जो मनुष्य ब्राह्मण का यज्ञ नष्ट करता है, वही पाप दूसरे की गाय चुराने और बेचने से भी लगता है। ॥5॥
 
O Lord! Whatever sins are committed by a person who destroys a Brahmin's sacrifice, the same faults are ascribed to stealing and selling another's cow. ॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas