श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 76: दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य  »  श्लोक 14-d1h
 
 
श्लोक  13.76.14-d1h 
उपाध्यायेन गदितं मम चेदं युधिष्ठिर।
य इदं ब्राह्मणो नित्यं वदेद् ब्राह्मणसंसदि॥ १४॥
यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वयोरपि समागमे।
तस्य लोका: किलाक्षय्या दैवतै: सह नित्यदा॥ १५॥
(इति ब्रह्मा स भगवान‍् उवाच परमेश्वर:)
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! मेरे उपाध्याय (परशुराम) ने मुझे यह विषय समझाया था। जो ब्राह्मण प्रतिदिन अपनी मंडली में बैठकर इस उपदेश को दोहराता है तथा यज्ञ के समय, गौदान के समय तथा दो व्यक्तियों के मिलन में भी इसकी चर्चा करता है, वह देवताओं के साथ सदैव अक्षयलोक को प्राप्त होता है। यह बात स्वयं परमेश्वर ब्रह्मा ने भी इंद्र को बताई है। ॥14-15॥
 
Yudhishthira! My Upadhyaya (Parashuram) had explained this topic to me. The Brahmin who repeats this advice every day while sitting in his group and discusses it during the yajna, at the time of cow donation and even in the meeting of two people, he always attains Akshaylok with the gods. This thing has also been told to Indra by the Supreme Lord Brahma himself. ॥ 14-15॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतु:सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७४॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं)
 
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