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श्लोक 13.76.12  |
राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने।
ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| प्रभु! श्री रामचंद्रजी ने अपने प्रिय एवं यशस्वी भाई लक्ष्मण को भी यही उपदेश दिया था। फिर लक्ष्मण ने भी वनवास के समय ऋषियों को यही बताया था। |
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| Lord! Shri Ramchandraji also preached this to his beloved and famous brother Lakshman. Then Lakshman also told this to the sages during his exile. |
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