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mahabharat 13.76.12: प्रभु! श्री रामचंद्रजी ने अपने प्रिय एवं यशस्वी भाई लक्ष्मण को भी यही उपदेश दिया था। फिर लक्ष्मण ने भी वनवास के समय ऋषियों को यही बताया था।   |   mahabharat अध्याय 13.76: दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 76: दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.76.12 
राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने।
ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो॥ १२॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! श्री रामचंद्रजी ने अपने प्रिय एवं यशस्वी भाई लक्ष्मण को भी यही उपदेश दिया था। फिर लक्ष्मण ने भी वनवास के समय ऋषियों को यही बताया था।
 
Lord! Shri Ramchandraji also preached this to his beloved and famous brother Lakshman. Then Lakshman also told this to the sages during his exile.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)