श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 75: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.75.8 
वाप्य: सरांसि सरितो विविधानि वनानि च।
गृहाणि पर्वताश्चैव यावद् ‍द्रव्यं च किंचन॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ बावड़ियाँ, झीलें, नदियाँ, नाना प्रकार के वन, घर और पर्वत आदि सब कुछ उपलब्ध है ॥8॥
 
Stepwells, lakes, rivers, various kinds of forests, houses and mountains etc. all are available there. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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