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श्लोक 13.75.6-7  |
तथा नास्त्यशुभं किंचिन्न व्याधिस्तत्र न क्लम:।
यद् यच्च गावो मनसा तस्मिन् वाञ्छन्ति वासव॥ ६॥
तत् सर्वं प्राप्नुवन्ति स्म मम प्रत्यक्षदर्शनात्।
कामगा: कामचारिण्य: कामात् कामांश्च भुञ्जते॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ किसी को किंचितमात्र भी विपत्ति नहीं आती । उस लोक में न तो रोग है और न शोक । इन्द्र ! वहाँ की गौएँ मन में जो कुछ चाहती हैं, वही उन्हें प्राप्त हो जाता है, यह मैंने अपनी आँखों से देखा है । वे जहाँ जाना चाहती हैं, वहाँ जाती हैं; जिस मार्ग से चाहती हैं, उसी मार्ग पर चलती हैं और केवल विचार मात्र से ही समस्त सुखों को प्राप्त करके उनका भोग करती हैं ॥6-7॥ |
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| No one faces even the slightest misfortune there. There is neither disease nor sorrow in that world. Indra! Whatever the cows there desire in their mind, they get it, this is a thing I have seen with my own eyes. They go wherever they want to go; they walk the way they want and by mere thought they obtain all the pleasures and enjoy them. ॥ 6-7॥ |
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