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mahabharat 13.73.57: हे ब्रह्मर्षि! धर्मराज की यह बात सुनकर मैंने उन पुण्यात्मा देवता को प्रणाम करके सिर झुकाया और फिर उनकी अनुमति लेकर आपके चरणों में लौट आया।   |   mahabharat अध्याय 13.73: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.73.57 
इत्युक्तोऽहं धर्मराजं द्विजर्षे
धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य।
अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन
प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! धर्मराज की यह बात सुनकर मैंने उन पुण्यात्मा देवता को प्रणाम करके सिर झुकाया और फिर उनकी अनुमति लेकर आपके चरणों में लौट आया।
 
O Brahmarshi! Upon hearing Dharamraj say this, I bowed my head in salutation to that virtuous deity and then after taking his permission, I returned to your feet.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमवाक्यं नाम एकसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यमराजका वाक्य नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)