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mahabharat 13.73.55: जब कोई शिष्य गौदान करने लगे, तो उसे उसे स्वीकार करने के लिए किसी गुरु का चुनाव करना चाहिए। यदि गुरु दान स्वीकार कर ले, तो शिष्य अवश्य ही स्वर्ग को प्राप्त होगा। जो लोग इस विधि को जानते हैं, उनके लिए यह गौदान महान धर्म है। इस प्रथम विधि में अन्य सभी विधियाँ समाहित हैं।॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 13.73: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.73.55 
गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने
स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव।
विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष
विधिं ह्याद्यं विधय: संविशन्ति॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जब कोई शिष्य गौदान करने लगे, तो उसे उसे स्वीकार करने के लिए किसी गुरु का चुनाव करना चाहिए। यदि गुरु दान स्वीकार कर ले, तो शिष्य अवश्य ही स्वर्ग को प्राप्त होगा। जो लोग इस विधि को जानते हैं, उनके लिए यह गौदान महान धर्म है। इस प्रथम विधि में अन्य सभी विधियाँ समाहित हैं।॥ 55॥
 
‘When a disciple starts donating a cow, he should choose a Guru to accept it. If the Guru accepts the donation, the disciple will surely go to heaven. For those who know the method, this donation of a cow is a great Dharma. All other methods are included in this first method.॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)