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mahabharat 13.73.4-5: उस यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण होने पर महर्षि ने अपने पुत्र से कहा- 'बेटा! मैंने सब लकड़ियाँ, कुशा, पुष्प, जल का घड़ा और प्रचुर अन्न (फल, मूल आदि) एकत्रित करके नदी के तट पर रख दिए और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओं को भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदी के तट से वे सब वस्तुएँ यहाँ ले आओ।'॥4-5॥   |   mahabharat अध्याय 13.73: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 73: पिताके शापसे नाचिकेतका यमराजके पास जाना और यमराजका नाचिकेतको गोदानकी महिमा बताना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  13.73.4-5 
समाप्ते नियमे तस्मिन् महर्षि: पुत्रमब्रवीत्।
उपस्पर्शनसक्तस्य स्वाध्यायाभिरतस्य च॥ ४॥
इध्मा दर्भा: सुमनस: कलशश्चातिभोजनम्।
विस्मृतं मे तदादाय नदीतीरादिहाव्रज॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण होने पर महर्षि ने अपने पुत्र से कहा- 'बेटा! मैंने सब लकड़ियाँ, कुशा, पुष्प, जल का घड़ा और प्रचुर अन्न (फल, मूल आदि) एकत्रित करके नदी के तट पर रख दिए और स्नान तथा वेदपाठ करने लगा। फिर उन सब वस्तुओं को भूलकर मैं यहाँ चला आया। अब तुम जाकर नदी के तट से वे सब वस्तुएँ यहाँ ले आओ।'॥4-5॥
 
After the completion of the rituals of that yagya, Maharshi said to his son- 'Son! I collected all the wood, kusha, flowers, a pitcher of water and abundant food items (fruits, roots etc.) and kept them on the bank of the river and started taking bath and reciting Vedas. Then forgetting all those things, I came here. Now you go and bring all those items from the river bank here.'॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)