श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 70: तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.70.21 
पुष्करिण्यस्तडागानि कूपांश्चैवात्र खानयेत्।
एतत् सुुदुर्लभतरमिहलोके द्विजोत्तम॥ २१॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य को यहाँ तालाब, पोखरे और कुएँ खुदवाने चाहिए। यह इस संसार में अत्यंत दुर्लभ पुण्य कर्म है। 21॥
 
Dwijshreshtha! Man should dig ponds, ponds and wells here. This is a very rare virtuous act in this world. 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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