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mahabharat 13.70.14: हे धर्म से कभी विचलित न होने वाले श्रेष्ठ एवं यशस्वी ब्राह्मण! अब अपने घर जाओ और अपनी इच्छानुसार मुझसे सब कुछ कहो। मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 13.70: तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.70.14 
गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलयं स्वं महाद्युते।
ब्रूहि सर्वं यथा स्वैरं करवाणि किमच्युत॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म से कभी विचलित न होने वाले श्रेष्ठ एवं यशस्वी ब्राह्मण! अब अपने घर जाओ और अपनी इच्छानुसार मुझसे सब कुछ कहो। मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?॥ 14॥
 
O great and illustrious Brahmin who never deviates from Dharma! Go to your home now and tell me everything according to your wish. What can I do for you?॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)