श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 70: तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  13.70.11-12 
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विज:॥ ११॥
उवाच धर्मराजानं निर्विण्णोऽध्ययनेन वै।
यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेयमिहाच्युत॥ १२॥
 
 
अनुवाद
धर्मराज के इस प्रकार आदेश देने पर अध्ययन से विरक्त ब्राह्मण ने उनसे कहा, 'हे धर्म से कभी विचलित न होने वाले स्वामी! मैं अपने शेष जीवन में यहीं रहूँगा।'
 
On being ordered by Dharmaraj in this manner, the Brahmin who was bored with his studies said to him, 'O lord who never deviates from Dharma! In the time remaining in my life, I shall stay here only.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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