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mahabharat 13.7.6: अतः मनुष्य को उचित है कि यदि उसके घर कोई अतिथि आए, तो वह प्रसन्न दृष्टि से उसकी ओर देखे। उसकी सेवा करे। मधुर वाणी से उसे प्रसन्न करे। जब वह जाने लगे, तो कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे जाए और जब तक वह रहे, तब तक उसका स्वागत करता रहे - ये पाँच बातें करना गृहस्थ के लिए पाँच प्रकार की दक्षिणा सहित यज्ञ कहलाता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 13.7: कर्मोंके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 7: कर्मोंके फलका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.7.6 
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम्।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञ: पञ्चदक्षिण:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अतः मनुष्य को उचित है कि यदि उसके घर कोई अतिथि आए, तो वह प्रसन्न दृष्टि से उसकी ओर देखे। उसकी सेवा करे। मधुर वाणी से उसे प्रसन्न करे। जब वह जाने लगे, तो कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे जाए और जब तक वह रहे, तब तक उसका स्वागत करता रहे - ये पाँच बातें करना गृहस्थ के लिए पाँच प्रकार की दक्षिणा सहित यज्ञ कहलाता है ॥6॥
 
Therefore, it is appropriate for a person that if a guest comes to his home, he should look at him with a happy eye. He should serve him. He should please him by speaking sweetly. When he starts leaving, he should follow him for some distance and keep on welcoming him as long as he stays - doing these five things is called a yajna with five types of dakshina for a householder. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)