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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 7: कर्मोंके फलका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.7.5 
न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रियैरिह।
ते ह्यस्य साक्षिणो नित्यं षष्ठ आत्मा तथैव च॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पाँचों इन्द्रियों द्वारा किया गया कर्म कभी नष्ट नहीं होता। वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन - ये उस कर्म के साक्षी हैं।
 
The karma done by the five senses is never destroyed. Those five senses and the sixth mind - these are the witnesses of that karma. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)