श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 7: कर्मोंके फलका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.7.2 
भीष्म उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि भारत।
रहस्यं यदृषीणां तु तच्छृणुष्व युधिष्ठिर।
या गति: प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- भरतनन्दन युधिष्ठिर! आप जो प्रश्न मुझसे पूछ रहे हैं, वह ऋषियों के लिए भी रहस्य का विषय है; फिर भी मैं आपको बता रहा हूँ। सुनिए, मैं मृत्यु के बाद मनुष्य को जो चिर अभिलाषित गति प्राप्त होती है, उसका भी वर्णन करूँगा॥ 2॥
 
Bhishmaji said-Bharatanandan Yudhishthir! What you are asking me is a subject of mystery even for the sages; but I am telling you. Listen, I will also describe the long-desired state a man gets after death.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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