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mahabharat 13.7.11: जो तपस्वी सिर झुकाकर या जल में रहता है, तथा जो सदा एकाकी शयन करता है (ब्रह्मचर्य का पालन करता है), वह अभीष्ट गति को प्राप्त होता है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 13.7: कर्मोंके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 7: कर्मोंके फलका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.7.11 
अवाक्शिरास्तु यो लम्बेदुदवासं च यो वसेत्।
सततं चैकशायी य: स लभेतेप्सितां गतिम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो तपस्वी सिर झुकाकर या जल में रहता है, तथा जो सदा एकाकी शयन करता है (ब्रह्मचर्य का पालन करता है), वह अभीष्ट गति को प्राप्त होता है ॥11॥
 
The ascetic who hangs head down or lives in water, and who always sleeps alone (observes celibacy), he attains the desired destination. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)