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mahabharat 13.68.15: पूर्वकाल में महामुनि परंतप कुशिक ने हवन समाप्त हो जाने पर तीनों अग्नियों में तिल डालकर उन्हें तृप्त किया था; ऐसा करके उन्होंने परम गति प्राप्त की थी ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 68: जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.68.15 
उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षि: परंतप:।
तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान् गतिमुत्तमाम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में महामुनि परंतप कुशिक ने हवन समाप्त हो जाने पर तीनों अग्नियों में तिल डालकर उन्हें तृप्त किया था; ऐसा करके उन्होंने परम गति प्राप्त की थी ॥15॥
 
In the past, the great sage Parantapa, Kushika, had satisfied the three fires by offering sesame seeds to them when the offerings had been finished; by doing this he attained the highest state. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)