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mahabharat 13.67.17: जो मनुष्य छाते का दान करता है, उसे पुत्र और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, उसकी आँखों में कोई रोग नहीं होता और उसे सदैव यज्ञ का भाग प्राप्त होता है॥17॥   |   mahabharat अध्याय 13.67: सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 67: सुवर्ण और जल आदि विभिन्न वस्तुओंके दानकी महिमा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.67.17 
पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य छाते का दान करता है, उसे पुत्र और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, उसकी आँखों में कोई रोग नहीं होता और उसे सदैव यज्ञ का भाग प्राप्त होता है॥17॥
 
The man who donates an umbrella gets a son and Lakshmi. His eyes do not suffer from any disease and he always gets a share in the yagya.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)