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श्लोक 13.67.17  |
पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य छाते का दान करता है, उसे पुत्र और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, उसकी आँखों में कोई रोग नहीं होता और उसे सदैव यज्ञ का भाग प्राप्त होता है॥17॥ |
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| The man who donates an umbrella gets a son and Lakshmi. His eyes do not suffer from any disease and he always gets a share in the yagya.॥ 17॥ |
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