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mahabharat 13.66.21: उपर्युक्त वस्तुओं को ब्राह्मणों को दान करने से मनुष्य को मनचाही आजीविका प्राप्त होती है तथा उसे कभी भी नरक आदि के कष्ट नहीं भोगने पड़ते। ऐसी शास्त्रों की मान्यता है।   |   mahabharat अध्याय 13.66: विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 66: विभिन्न नक्षत्रोंके योगमें भिन्न-भिन्न वस्तुओंके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.66.21 
दत्त्वा यथोक्तं विप्रेभ्यो वृत्तिमिष्टां स विन्दति।
नरकादींश्च संक्लेशान् नाप्नोतीति विनिश्चय:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उपर्युक्त वस्तुओं को ब्राह्मणों को दान करने से मनुष्य को मनचाही आजीविका प्राप्त होती है तथा उसे कभी भी नरक आदि के कष्ट नहीं भोगने पड़ते। ऐसी शास्त्रों की मान्यता है।
 
By donating the above-mentioned things to Brahmins, a man gets the livelihood he wants and never has to suffer the pains of hell etc. This is the belief of the scriptures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)