श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.65.5 
नारद उवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा।
लोकतन्त्रं हि संज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले - देवता और ऋषिगण अन्न की ही प्रशंसा करते हैं, अन्न ही लोगों का पालन-पोषण करता है, बुद्धि उसी से प्रेरणा पाती है और उसी अन्न में सब कुछ स्थित है ॥5॥
 
Naradji said – Gods and sages praise food only, it is only food that sustains the people. The intellect gets inspiration from it and everything is established in that food only. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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