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mahabharat 13.65.25-26: नरेश्वर! अन्न ही मनुष्यों का प्राण है, अन्न में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, अतः अन्नदान करने वाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और सौन्दर्य भी प्राप्त करता है। जो मनुष्य संसार को अन्नदान करता है, वह प्राणदाता और सर्वस्वदाता कहलाता है॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 13.65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.65.25-26 
अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्।
अन्नद: पशुमान् पुत्री धनवान् भोगवानपि॥ २५॥
प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप।
अन्नद: प्राणदो लोके सर्वद: प्रोच्यते तु स:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! अन्न ही मनुष्यों का प्राण है, अन्न में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, अतः अन्नदान करने वाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और सौन्दर्य भी प्राप्त करता है। जो मनुष्य संसार को अन्नदान करता है, वह प्राणदाता और सर्वस्वदाता कहलाता है॥25-26॥
 
Nareshwar! Food is the life of humans, everything is established in food, hence a person who donates food also gets animals, son, wealth, enjoyment, strength and beauty. The man who donates food to the world is called the giver of life and the giver of everything. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)