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mahabharat 13.65.22-23: भारत! ब्राह्मण सभी मनुष्यों का अतिथि है और सबसे पहले भोजन पाने का अधिकारी है। जिस घर में ब्राह्मण सदैव भिक्षा मांगने जाता है और वहाँ से सम्मानित होकर लौटता है, उस घर की सम्पत्ति बढ़ती है और उस घर का स्वामी मरने के बाद बड़े सौभाग्यशाली कुल में जन्म लेता है।   |   mahabharat अध्याय 13.65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.65.22-23 
ब्राह्मण: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्।
विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा॥ २२॥
सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते।
महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भारत! ब्राह्मण सभी मनुष्यों का अतिथि है और सबसे पहले भोजन पाने का अधिकारी है। जिस घर में ब्राह्मण सदैव भिक्षा मांगने जाता है और वहाँ से सम्मानित होकर लौटता है, उस घर की सम्पत्ति बढ़ती है और उस घर का स्वामी मरने के बाद बड़े सौभाग्यशाली कुल में जन्म लेता है।
 
Bharat! A Brahmin is the guest of all human beings and is entitled to be fed first. The house where a Brahmin always goes to beg for alms and returns after being honoured there, the wealth of that house increases and the owner of that house is born in a very fortunate family after his death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)