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mahabharat 13.65.21: ब्राह्मण महान प्राणी है। यदि वह स्वयं इस प्रकार 'मुझे भोजन दो' कहकर भोजन मांगता है, तो मनुष्य को उसे चाहे तृप्तिपूर्वक या निःस्वार्थ भाव से भोजन दान करके पुण्य प्राप्त करना चाहिए। 21॥   |   mahabharat अध्याय 13.65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 65: अन्नदानका विशेष माहात्म्य  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.65.21 
ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचति।
अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण महान प्राणी है। यदि वह स्वयं इस प्रकार 'मुझे भोजन दो' कहकर भोजन मांगता है, तो मनुष्य को उसे चाहे तृप्तिपूर्वक या निःस्वार्थ भाव से भोजन दान करके पुण्य प्राप्त करना चाहिए। 21॥
 
Brahmin is a great being. If he himself begs for food in this way ‘give me food’, then a person should attain virtue by donating food to him whether in a gratifying or selfless manner. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)