श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक d2h-55
 
 
श्लोक  13.64.d2h-55 
बृहस्पतिरुवाच
सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन्।
(विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम्।)
दददेतान् महाप्राज्ञ: सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पति बोले - वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र ! स्वर्ण दान, भूमि दान, विद्या दान और कन्या दान - ये अत्यंत पापमय माने गए हैं । जो परम बुद्धिमान मनुष्य इन सब वस्तुओं का दान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥55॥
 
Brihaspati said – Indra who killed Vritrasura! Donation of gold, donation of land, donation of education and donation of daughter-these are considered extremely sinful. The most intelligent person who donates all these things becomes free from all sins. 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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