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श्लोक 13.64.96  |
इत्येतत् सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ।
मया भरतशार्दूल किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ ९६॥ |
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| अनुवाद |
| हे निष्पाप भरत! इस प्रकार मैंने तुम्हें पृथ्वीदान का माहात्म्य बताया, जो सब दानों में श्रेष्ठ है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥96॥ |
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| O sinless Bharata! In this way I have explained to you the significance of the donation of the earth, which is the best of all donations. What more do you wish to hear?॥96॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे द्विषष्टितमोऽध्याय:॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९८ १/२ श्लोक हैं) |
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