श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  13.64.92 
अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत्।
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरु:।
नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधि:॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
भूमि का दान करने वाले को अमृतमयी भूमि प्राप्त होती है। भूमि के समान कोई दान नहीं है। माता के समान कोई गुरु नहीं है। सत्य के समान कोई धर्म नहीं है और दान के समान कोई निधि नहीं है ॥92॥
 
A person who donates land receives land which produces nectar. There is no donation like land. There is no teacher like mother. There is no religion like truth and there is no treasure like charity. ॥92॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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