श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  13.64.84 
यथाप्सु पतित: शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति।
तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! जैसे तेल की बूँद जल में गिरने पर चारों ओर फैल जाती है, उसी प्रकार दान की गई भूमि पर जितना अन्न उत्पन्न होता है, दान का मूल्य उतना ही बढ़ता है ॥ 84॥
 
Indra! Just as a drop of oil falling into water spreads all around, similarly the amount of grain grown on a donated land increases the value of the donation. ॥ 84॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd