श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  13.64.83 
विधूय कलुषं सर्वं विरजा: सम्मत: सताम्।
लोके महीयते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम्॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
जो पृथ्वी का दान करता है, वह अपने समस्त पापों का नाश करके पवित्र हो जाता है और सत्पुरुषों के आदर का पात्र बन जाता है। तथा संसार के श्रेष्ठ पुरुष सदैव उसका आदर करते हैं ॥ 83॥
 
He who donates the earth, destroys all his sins and becomes pure and worthy of the respect of good men. And the noble men of the world always respect him. ॥ 83॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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