श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  13.64.80 
भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद् यस्तु संस्थापयेन्नर:।
तस्य वास: सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! जो मनुष्य राज्य से गिरे हुए राजा को पुनः सिंहासन पर बिठाता है, वह स्वर्ग में निवास करता है और वहाँ महान् सम्मान प्राप्त करता है ॥80॥
 
Indra! The person who restores a king who has fallen from his reign to his throne, resides in heaven and receives great respect there. ॥ 80॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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