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श्लोक 13.64.78  |
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्ते: कदाचन॥ ७८॥ |
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| अनुवाद |
| श्रेष्ठ! देवेश्वर! जिस ब्राह्मण की जीविका नष्ट हो गई हो, उसे किसी दूसरे से दान में प्राप्त हुई भूमि कभी नहीं छीननी चाहिए ॥78॥ |
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| Best! Deveshwar! A Brahmin whose livelihood has been destroyed should never snatch the land he has received as a donation from someone else. 78॥ |
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