श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  13.64.78 
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्ते: कदाचन॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ! देवेश्वर! जिस ब्राह्मण की जीविका नष्ट हो गई हो, उसे किसी दूसरे से दान में प्राप्त हुई भूमि कभी नहीं छीननी चाहिए ॥78॥
 
Best! Deveshwar! A Brahmin whose livelihood has been destroyed should never snatch the land he has received as a donation from someone else. 78॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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