vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद
»
श्लोक 78
श्लोक
13.64.78
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्ते: कदाचन॥ ७८॥
अनुवाद
श्रेष्ठ! देवेश्वर! जिस ब्राह्मण की जीविका नष्ट हो गई हो, उसे किसी दूसरे से दान में प्राप्त हुई भूमि कभी नहीं छीननी चाहिए ॥78॥
Best! Deveshwar! A Brahmin whose livelihood has been destroyed should never snatch the land he has received as a donation from someone else. 78॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×