श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  13.64.68 
सर्वदा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता।
भूर्देया विधिवच्छक्र पात्रे सुखमभीप्सुना॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! जो राजा सदैव धन चाहता है और सुख की इच्छा रखता है, उसे योग्य व्यक्ति को विधिपूर्वक भूमि दान करनी चाहिए ॥68॥
 
Indra! The king who always wants wealth and wishes to attain happiness should donate land to the deserving person in a proper manner. 68॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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