श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  13.64.67 
पुण्यामृद्धिरसां भूमिं यो ददाति पुरंदर।
न तस्य लोका: क्षीयन्ते भूमिदानगुणान्विता:॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
पुरन्दर! जो मनुष्य परम पवित्र और ऐश्वर्यरूपी रस से परिपूर्ण पृथ्वी का दान करता है, वह उस पृथ्वी के दान से युक्त गुणों से युक्त सनातन लोकों को प्राप्त करता है ॥ 67॥
 
Purandara! He who donates the earth which is most pure and full of the juice of prosperity, obtains eternal worlds endowed with the qualities associated with the donation of that earth. ॥ 67॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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