श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.64.6 
स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च।
भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही इस लोक और परलोक में जीवन जीते हैं। पृथ्वी धन और समृद्धि की प्रतिमूर्ति है। यह दान देने वाले को अपना प्रिय बनाती है।
 
Human beings live their lives in this world and the next according to their deeds. The earth is the embodiment of wealth and prosperity. It makes the donor its favourite.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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