श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.64.53 
मघवोवाच
भगवन् केन दानेन स्वर्गत: सुखमेधते।
यदक्षयं महार्घं च तद् ब्रूहि वदतां वर॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र बोले - "हे वक्ताओं में श्रेष्ठ प्रभु! किस दान के प्रभाव से दाता को स्वर्ग से भी अधिक सुख प्राप्त होता है? उस दान के विषय में मुझे बताइए जिसका फल अक्षय और अधिक महत्त्वपूर्ण है।" ॥53॥
 
Indra said, "O Lord, the best of speakers! By the effect of which donation the donor gets more happiness than even heaven? Tell me about the donation whose fruit is everlasting and more important." ॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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