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श्लोक 13.64.41-42  |
अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिक:।
न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च॥ ४१॥
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नरा:।
योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत्॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| जिसका राजा नास्तिक हो, धर्म को न जानता हो, वे लोग न तो चैन से सोते हैं, न चैन से जागते हैं; बल्कि वे सदैव उस राजा के कुकर्मों से चिन्तित रहते हैं। ऐसे राजा के राज्य में प्रायः कल्याण नहीं होता। |
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| People whose king is an atheist and does not know religion, neither sleep comfortably nor wake up comfortably; rather they are always worried about the misdeeds of that king. In the kingdom of such a king, one does not often attain welfare. |
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