श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  13.64.41-42 
अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिक:।
न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च॥ ४१॥
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नरा:।
योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जिसका राजा नास्तिक हो, धर्म को न जानता हो, वे लोग न तो चैन से सोते हैं, न चैन से जागते हैं; बल्कि वे सदैव उस राजा के कुकर्मों से चिन्तित रहते हैं। ऐसे राजा के राज्य में प्रायः कल्याण नहीं होता।
 
People whose king is an atheist and does not know religion, neither sleep comfortably nor wake up comfortably; rather they are always worried about the misdeeds of that king. In the kingdom of such a king, one does not often attain welfare.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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