श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.64.35 
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ।
अस्मिल्‍ँलोके परे चैव तद् दत्तं जायते पुन:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वह श्लोक इस प्रकार है - (पृथ्वी कहती है -) 'मुझे दान दो, मुझे स्वीकार करो। मुझे देने से ही तुम मुझे पाओगे; क्योंकि मनुष्य इस लोक में जो कुछ दान करता है, वही इस लोक और परलोक में भी पाता है।'॥ 35॥
 
That verse is like this - (The Earth says -) 'Give me in charity, accept me. You will get me only by giving me; because whatever a man donates in this world, he receives the same in this world and the next world as well.'॥ 35॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd