श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.64.31 
फालकृष्टां महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि।
उदीर्णं वापि शरणं यथा भवति कामद:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य जोती, बोई और काटी हुई फसल से भरी हुई भूमि का एक टुकड़ा दान करता है अथवा अपने लिए एक बड़ा मकान बनवाता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं ॥31॥
 
A person who donates a piece of land filled with ploughed, sown and harvested crops, or gets a large house built for him, all his desires are fulfilled. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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