| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद » श्लोक 24 |
|
| | | | श्लोक 13.64.24  | तपो यज्ञ: श्रुतं शीलमलोभ: सत्यसंधता।
गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम्॥ २४॥ | | | | | | अनुवाद | | जो मनुष्य पृथ्वी का दान करता है, उसे तप, यज्ञ, ज्ञान, सज्जनता, लोभ का अभाव, सत्य, गुरुभक्ति और अपने देवता के धन का फल प्राप्त होता है ॥24॥ | | | | A person who donates the earth gets the fruits of penance, yagya, knowledge, gentleness, absence of greed, truthfulness, devotion to his Guru and wealth of his deity. 24॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|