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श्लोक 13.64.22  |
अपि चेत् सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिता:।
अशङ्कॺमेकमेवैतद् भूमिदानमनुत्तमम्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| अन्य किसी पुण्य कर्म के फल के विषय में विद्वानों को भी संदेह हो सकता है; किन्तु यह श्रेष्ठ भूमिदान ही एकमात्र ऐसा पुण्य कर्म है जिसके फल के विषय में किसी को संदेह नहीं हो सकता ॥22॥ |
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| It is possible that even learned men may have doubts about the reward of doing any other virtuous deed; But this best donation of land is the only good deed about whose outcome no one can have any doubt. 22॥ |
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