श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 64: सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.64.11 
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधव:।
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ पुरुष पापी राजाओं से पृथ्वी का दान तो ले लेता है, परन्तु अन्य कोई वस्तु दान में नहीं लेना चाहता। पृथ्वी माता के समान पवित्र है॥11॥
 
A noble person accepts the donation of the earth from sinful kings but does not want to accept any other thing as a donation. The earth is as pure as a mother.॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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