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mahabharat 13.63.7: यज्ञ में तुम सदाचारी, सदाचारी, तपस्वी, वेदों के ज्ञाता, मित्रवत और साधुवत ब्राह्मणों को धन देकर संतुष्ट करो।॥7॥   |   mahabharat अध्याय 13.63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.63.7 
ब्राह्मणांस्तर्पयन् द्रव्यैस्ततो यज्ञे यतव्रत:।
मैत्रान् साधून् वेदविद: शीलवृत्ततपोर्जितान्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यज्ञ में तुम सदाचारी, सदाचारी, तपस्वी, वेदों के ज्ञाता, मित्रवत और साधुवत ब्राह्मणों को धन देकर संतुष्ट करो।॥7॥
 
In the Yagya, you should satisfy the well-mannered, virtuous, ascetic, knowledgeable about Vedas, friendly and saintly Brahmins by giving them money in the Yagya. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)