| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश » श्लोक 37-38 |
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| | | | श्लोक 13.63.37-38  | जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजा: सर्वा युधिष्ठिर।
पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजा:॥ ३७॥
कुबेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामरा:।
ज्ञातयस्त्वानुजीवन्तु सुहृदश्च परंतप॥ ३८॥ | | | | | | अनुवाद | | हे युधिष्ठिर! जिस प्रकार समस्त प्राणी बादलों के सहारे जीवित रहते हैं, पक्षी बड़े-बड़े वृक्षों के आश्रय में रहते हैं, दैत्य कुबेर पर और देवता इन्द्र पर निर्भर रहते हैं, उसी प्रकार जब तक आप जीवित हैं, आपकी समस्त प्रजा आपसे ही जीविका चलाये तथा आपके मित्र-सम्बन्धी भी आपसे ही जीवन निर्वाह करें। | | | | O great Yudhishthira! Just as all living beings survive on the support of clouds, just as birds live under the shelter of big trees, just as demons survive on Kubera and gods on Indra, similarly, while you are alive, all your subjects should earn their livelihood from you and your friends and relatives should also live on you. | | | इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकषष्टितमोऽध्याय:॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/२ श्लोक हैं) | | | | ✨ ai-generated | | |
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