श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.63.35 
अथाहु: सर्वमेवैति भूयोऽर्धमिति निश्चय:।
चतुर्थं मतमस्माकं मनो: श्रुत्वानुशासनम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग कहते हैं कि सारे पाप राजा पर पड़ते हैं। कुछ अन्य लोग मानते हैं कि राजा आधे पापों का भागी होता है। किन्तु मनु के उपदेशों को सुनने के बाद हमारा मत है कि राजा को केवल एक-चौथाई पाप ही प्राप्त होता है ॥35॥
 
Some people say that all sins fall on the king. Others believe that the king is responsible for half the sins. But after listening to Manu's teachings, our opinion is that the king receives only one-fourth of the sins. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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