श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.63.3 
अन्तर्वेद्यां च यद् दत्तं श्रद्धया चानृशंस्यत:।
किंस्विन्नै:श्रेयसं तात तन्मे ब्रूहि पितामह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
प्रिय दादाजी! इन दोनों में से कौन अधिक लाभदायक है - भक्तिपूर्वक वेदी के अन्दर दिया गया दान और दयापूर्वक वेदी के बाहर दिया गया दान? ॥3॥
 
Dear Grandfather! Which of the two is more beneficial - the donation given inside the altar with devotion and the one given outside the altar out of compassion? ॥3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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