श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 63: राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.63.20 
ब्राह्मणेषु प्रमूढेषु धर्मो विप्रणशेद् ध्रुवम्।
धर्मप्रणाशे भूतानामभाव: स्यान्न संशय:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जब ब्राह्मण मोहग्रस्त हो जाता है, तब उसका धर्म अवश्य नष्ट हो जाता है और जब धर्म नष्ट हो जाता है, तब प्राणी भी नष्ट हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥20॥
 
When a brahmin is bewildered, his Dharma (righteousness) is certainly destroyed, and when Dharma is destroyed, even living beings are destroyed; there is no doubt about this. ॥20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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