श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.62.8 
तपसा दीप्यमानास्ते दहेयु: पृथिवीमपि।
अपूज्यमाना: कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधा:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! जो ब्राह्मण तपस्या से तेजस्वी हैं, यदि उनकी पूजा न की जाए, तो वे चाहें तो सम्पूर्ण पृथ्वी को जलाकर राख कर सकते हैं; अतः ऐसे ब्राह्मण सदैव पूजनीय हैं॥8॥
 
O son of Kuru! Those Brahmins who are radiant with austerity can, if they wish, burn the entire earth to ashes if they are not worshipped; hence such Brahmins are always worthy of worship. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)